
शहर की भागदौड़ और संवेदनहीन होती भीड़ के बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने हर देखने वाले के दिल को छू लिया। सिर पर गठरी, हाथ में कागज़ की पिनयों की एक बाल्टी और झोले में एक नन्हा पिल्ला , यह दृश्य अपने आप में एक मार्मिक दास्तान कहता है। यह कहानी है उस गरीब महिला की, जिसके पास न घर है, न रोज़गार, न ही पेट भरने का ठिकाना, लेकिन इंसानियत और ममता की ऐसी मिसाल है जो समाज को आईना दिखा जाए।
कड़कड़ाती सर्दी में जब लोग अपने घरों में दुबके रहते हैं, वही महिला खुले आसमान के नीचे जिंदगी बिताती है। बावजूद इसके उसके चेहरे पर न शिकायत है, न बेबसी का आक्रोश। उसकी आंखों में सिर्फ उस पिल्ले के लिए ममता दिखाई देती है, जिसे वह अपनी गोद में ऐसे संभालकर चलती है जैसे कोई मां अपने बच्चे को लेकर निकल पड़ी हो। उसका कहना है कि “यह भी ईश्वर की देन है, इसे भूखा या ठंड में कैसे छोड़ दूं?”
राहगीरों ने बताया कि अक्सर देखा जाता है कि वह खुद भूखी रह जाती है, लेकिन पिल्ले के लिए कुछ न कुछ इंतज़ाम जरूर करती है। कई बार उसे कड़कड़ाती हवाओं से बचाने के लिए अपने कपड़ों में ढकते हुए भी देखा गया है। उसकी इस ममता को देखकर लोग रुकते हैं, देखते हैं, कई की आंखें भर आती हैं।
इस दृश्य ने एक बार फिर साबित कर दिया कि गरीबी इंसानियत को खत्म नहीं कर सकती। उस महिला के पास भले ही खाने के दो दाने नहीं, लेकिन दिल इतना बड़ा है कि उसमें पूरा संसार समा जाए। उसकी संवेदनाएं बताती हैं कि दुनिया अब भी उन लोगों की वजह से खूबसूरत है, जिनकी जिंदगी कठिन है लेकिन दिल रोशन है।





